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श्री गिरनार तीर्थ की आराधना के साथ चातुमार्सिक

(उमा वाणी )न्यूज रायपुर

श्री गिरनार तीर्थ की आराधना के साथ चातुमार्सिक

प्रवचन की हुई शुरूआत, 75 श्रावक-श्राविकाओं ने किया तप

*आत्मा का श्रृंगार करने का समय है चातुर्मासः श्री हंसकीर्ति श्रीजी*

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी में आज परम पूज्य साध्वी भगवंत श्री हंसकीर्ति श्री जी म. सा. आदि ठाणा की पावन निश्रा में आत्मोत्थान वर्षावास 2025 का भव्य शुभारंभ हुआ। साथ ही श्री गिरनार तप आराधना का शुभारंभ हुआ, जिसमें 75 श्रावक-श्राविकाओं ने तप किया। नागदा के प्रसिद्ध विधिकारक विपिनभाई वागरेचा द्वारा श्री गिरनार तप की क्रियाविधि संपन्न करवाई। यह विशेष तप आराधना श्री नेमिनाथ भगवान के जन्म, दीक्षा एवं केवलज्ञान कल्याणक की स्मृति में की जा रही है। तप, जप और आराधना के क्रम में छठ पारणा (बियासना), एकांतर आठ उपवास, अट्ठम तप, एकांतर सात उपवास एवं पुनः छठ पारणा जैसे अनुक्रम शामिल है। जिसमें कुल मिलाकर 22 उपवास और 17 बियासना की भव्य आराधना संपन्न होगी।

इस अवसर पर जिनवाणी जिस सूत्र के माध्यम से श्रवण की जाएगी, उस सूत्र को बोहराने का लाभ श्रीमती पानी बाई आसकरण जी भंसाली परिवार को मिला। वहीं, मतिज्ञान का लाभ गौतमचंद जी संकलेचा परिवार, श्रुतिज्ञान का लाभ भागचंदजी अजित जी मूणोत परिवार, अवधि ज्ञान का लाभ सुमित परिवार, मनः पर्भवज्ञान का लाभ श्री पारसचंदजी गोलछा परिवार और केवल ज्ञान का लाभ प्रकाश जी प्रवीण जी दस्सानी परिवार को मिला।

चातुर्मासः आत्मा का श्रृंगार करने का अवसर

परम पूज्य साध्वी भगवंत श्री हंसकीर्ति श्री जी म. सा. ने चातुर्मास के पहले दिन बुधवार को कहा कि चातुर्मास के ये चार महीने त्याग, संयम और धर्म की साधना के हैं। यह केवल मौसम परिवर्तन का काल नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर झांकने और उसे संवारने का समय है। इन महीनों में हमें बाहरी सजावट- जैसे कॉस्मेटिक्स, फैशनेबल कपड़े और चप्पल-जूतों का श्रृंगार छोड़कर आत्मा का श्रृंगार करना चाहिए। चातुर्मास हमें याद दिलाता है कि असली सुंदरता शरीर में नहीं, आत्मा में बसती है।

चातुर्मास के दौरान सामायिक का विशेष महत्व होता है। सामायिक यानी 48 मिनट तक श्रावक साधु के समान जीवन जीता है। इस अवधि में वह सांसारिक मोह-माया से खुद को दूर रखते हुए धर्म के प्रति समर्पित रहता है। जैसे एक लकड़हारा जब अपने सिर से लकड़ियों का गट्ठर उतारता है, तो उसे एक गहरा हल्कापन महसूस होता है, वैसे ही हम भी इस दौरान अपने जीवन के पापों और गलतियों का बोझ हल्का कर सकते हैं।

यह चातुर्मास आत्मिक चिकित्सा का शिविर है। इसमें हमें अपने भीतर की कमजोरियों का इलाज करना है। क्रोध को क्षमा की थेरेपी देनी है, आत्मा के मोतियाबिंद का ऑपरेशन करना है, लोभ के लकवे का इलाज संतोष से करना है, और निंदा-ईर्ष्या जैसे विकारों को तप के टॉनिक और त्याग की टैबलेट से ठीक करना है। हर दिन आत्मा की ओपीडी खुलेगी- सुबह 8ः45 से 9ः45 तक, जिसमें आत्मा की स्थिति का मूल्यांकन और सुधार किया जाएगा।

चातुर्मास में पौषद का भी अलग महत्व है। पौषद का अर्थ है एक दिन के लिए आचार्य के समान जीवन जीना- यानी भोजन, व्यापार और दिनचर्या का त्याग कर तप और साधना में लीन रहना। यह आत्मा को प्रभु के करीब लाने की प्रक्रिया है। हम सुखों की लत में फंसकर प्रभु को भूल बैठे हैं, अब समय है कि अपने जीवन की दिशा को मोड़ें और प्रभु की भक्ति में मन लगाएं।

एक महत्वपूर्ण अध्याय है स्वाध्याय- यानी स्वयं का अध्ययन। आज हम अपने शरीर को फिट रखने और सुंदरता बनाए रखने की दिशा में अपना कीमती समय बर्बाद करते हैं, लेकिन आत्मा के लिए शायद ही कुछ समय निकालते हैं। चातुर्मास हमें सिखाता है कि यह जन्म केवल शरीर सजाने के लिए नहीं, आत्मा को परमात्मा के रूप में विकसित करने के लिए मिला है। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक, अगर हम आत्मा के लिए कुछ समय भी नहीं निकाल पा रहे हैं, तो यह जीवन अधूरा रह जाएगा।

निंदा और प्रशंसा का विषय भी इस चातुर्मास में विचार करने योग्य है। अक्सर हम दूसरों की निंदा और अपनी प्रशंसा में लगे रहते हैं। जबकि सच्चा धर्म यह सिखाता है कि हमें स्वयं की आलोचना और दूसरों की प्रशंसा करनी चाहिए। यही आत्मविकास की दिशा है।

चातुर्मास आत्मिक रूपांतरण का काल है। हमें ऐसा सकारात्मक परिवर्तन लाना है कि हमारे परिवारजन भी कहें- वह बदल गया है, अब पहले जैसा नहीं रहा। यह केवल उपदेशों का समय नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने का अवसर है।

साथ ही, उन्होंने श्रावक के नियमों यानी छह कर्तव्यों के बारे में बताया, जिन्हें इस चातुर्मास में हर श्रावक को अपनाना चाहिए। ये हैं- मंदिर दर्शन और पूजा करना, गुरुदेव के दर्शन और वंदन करना, स्वाध्याय करना, प्रवचन सुनना, गुरु से ज्ञान लेना, संयम में रहना और अपनी सीमा में जीना, यथाशक्ति नियमों का पालन करना, तप करना और दान देना। यही वे कर्तव्य हैं जो हमें आत्मा की उन्नति की ओर ले जाते हैं।

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