सर्वेश्वर महादेव के प्रथम वर्षगांठ के उपलक्ष्य में हमिंग कोटरी,रायपुर में आयोजित भागवत सत्संग का आज द्वितीय दिवस पूर्ण हुआ।

आचार्य युगल किशोर जी ने सर्वप्रथम ग्लोबल वार्मिंग पर बात करते हुए श्रोताओं को सचेत किया की आज ही अगर संकल्पित भाव से हमने इस तपन को नहीं रोका तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा आने वाले समय में बच्चें अपने माता पिता से पूछेंगे की जब पृथ्वी जल रही थी तो आपलोगों ने क्या किया क्यों हाथ पे हाथ धरे बैठे रहे।
आचार्य जी ने इसका एक कारण वैचारिक अशुद्धता को बताया।
आज लोग इतने भौतिकवादी हो चुके है कि अत्यंत क्षुद्र कामनाओं को प्राप्त करने के चक्कर में न जाने कैसा कैसा अपराध करते रहते हैं।
वास्तव में सत्संग सद्कर्म की प्रेरणा देता है क्या करें क्या न करें जब जीवन में खुद का सच्चा परिचय हो जाता है तो सच्चे उद्देश्य की भी जानकारी हो जाती है और तब जाकर एक व्यक्ति का व्यक्तित्व निखर कर आता है।
आज धर्म के नाम पर जो पाखंड चल रहा है,इसका परिणाम अत्यंत भयावह होने वाला है।धर्म मनोकामना पूर्ति की बात करता ही नहीं वरन मनोशुद्धि की बात करता है।
और मनोकामना की पूर्ति हेतु मनुष्य मंदिर में भी जाकर मनमोहन से न जाने कैसी कैसी भोग की मांग करता है।
निर्मल धर्म तो वह है जो व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं बल्कि उसके लिए क्या आवश्यक है उसकी युक्ति प्रदान करें।धर्म दुख को नहीं अतएव समूल कारण को मिटा देता है।
पंडित जी ने कहा कि हर वो कार्य जो एक मानव को उसके मूल अस्तित्व से जोड़ने का प्रयास करें वही सच्चा धर्म अन्यथा केवल पाखंड है।
सत्संग में विविध विविध प्रकरण से आस्था के द्वारा अस्तित्व की यात्रा कराया जाना ही सच्चा धर्म और सच्ची भक्ति है।
आज विषय चिंतन में व्यक्ति इतना उलझा हुआ है की विकास के नाम पर सभ्यता के नाम पर संस्कृति यहां तक उपासना और पूजा पद्धति के भी नाम पर उलजुलुल व्यवहार में कर रहा है।
जिसके कारण भौतिक वस्तुओं की उपयोगिता आवश्यकता से अधिक होने लगी।
जब व्यक्ति अपने सहज व्यवहार को त्याग कर भोग में लिप्त होता है तो वह कमजोर हो जाता है उसे अत्यधिक संसाधन की आवश्यकता होती है और जब डिमांड किसी वस्तु का बढ़ता है तो व्यापारिक दृष्टिकोण वाले लोग प्रकृति को दांव में लगाकर पैसा बनाने में लग जाते हैं।
अंधाधुंध वृक्ष काटा जाता है,बेहिसाब जल का दुरुपयोग किया जाता है,ऑक्सीजन को प्रदूषित किया जाता है।
अग्नि असीमित उत्सर्जन किया जाता है मिट्टी का दुरुपयोग किया है।
और इन सबसे धीरे धीरे मानव की क्षमता और घटते जाती है।
पंडित जी ने श्रोताओं से आग्रह किया कि आप अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाएं समाज को सुंदर सुदृढ़ और समझदार बनाएं।विपरीत स्थिति में भी अपने मन को स्वयं के अनुकूल बनाएं।
तब जाकर भोग की वृत्ति शांत होगी और कुछ हद तक हम ग्लोबल वार्मिंग को रोक पाएंगे।
आचार्य जी ने परीक्षित की कथा के माध्यम से श्रोताओं को समझाया की राजा परीक्षित चक्रवर्ती सम्राट था लेकिन अत्यंत संयमी और सत्संगी था।
एक दिन उससे भूल हो गई भोग की अभिलिप्षा में उन्होंने एक दिन जंगल में आखेट किया जिससे उनके द्वारा संत का अपमान हो गया।
भोग की प्राप्ति की मनसा ही पाप का मूल कारण है।
गलतियां व्यक्ति से हो जाए ये कोई बड़ी बात नहीं है बस गलती करके अगर किसी को वह गलत न लगें तो वह बड़ा अपराध है।
यहां परिक्षित को जब सप्त दिवस पश्चात मृत्यु का श्राप लगा तो उन्होंने परिस्थिति से युद्ध नहीं बल्कि समझा।समझ बड़ी बात होती है।
खुद की समझ जब होती है तो श्राप भी आशीर्वाद बन जाता है।
पंडित जी ने आज सभी को संकल्प दिलवाया की अपने जीवन में जितना ज्यादा हो वृक्ष लगाएं एवं स्वयं वृक्षारोपण किया और सेवा करने को कहा | कथा में हमिंग कोटरी आयोजक समिति के सम्पूर्ण सदस्य एवं सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।



