कमरछठ पर्व : मातृत्व, कृषि एवम् ग्रामीण जीवन से जुड़ा पर्व
कमरछठ पर्व : मातृत्व, कृषि एवम् ग्रामीण जीवन से जुड़ा पर्व

यह मुख्य रूप से भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, और झारखंड राज्यों में मनाया जाने वाला एक लोक पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है और इसमें संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
इस पर्व का संबंध देवी “संतोषी माता” से है, जिन्हें संतान की रक्षा और उनके कल्याण के लिए पूजा जाता है। महिलाएँ इस दिन व्रत रखती हैं और विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करती हैं। शाम को सामूहिक रूप से पूजा अर्चना की जाती है, जिसमें महिलाएँ पारंपरिक गीत गाते हुए प्रसाद अर्पित करती हैं।
इस पर्व का मुख्य उद्देश्य मातृत्व और संतान के प्रति माँ की भक्ति और समर्पण को प्रकट करना है। इसे भारतीय समाज में माँ के स्थान और उसकी महत्ता को उजागर करने वाले त्योहारों में से एक माना जाता है।
कमरछठ पर्व, जिसे कभी-कभी “कमरच्छठ” या “हलषष्ठी” के नाम से भी जाना जाता है, खासतौर से महिलाओं द्वारा संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए मनाया जाता है। इस पर्व का खास महत्व उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलता है, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में।
कमरछठ का महत्व:
– **मातृत्व का सम्मान:** यह पर्व मातृत्व और संतान के बीच के पवित्र संबंध को मजबूत करता है। माताएँ अपने बच्चों की भलाई, दीर्घायु, और उनकी सभी बाधाओं से रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं।
– **देवी की पूजा:** इस दिन महिलाएँ देवी “संतोषी माता” या “हलषष्ठी माता” की पूजा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से देवी बच्चों की रक्षा करती हैं और उनके जीवन में आने वाली सभी समस्याओं को दूर करती हैं।
– **कृषि से जुड़ा पर्व:** यह पर्व कृषि जीवन से भी जुड़ा है। इस दिन महिलाएँ खेतों में जाकर हल और बैल की पूजा करती हैं, क्योंकि यह पर्व फसलों की सुरक्षा और अच्छी पैदावार की भी कामना करता है।
पर्व की विधि:
– **व्रत का पालन:** इस दिन महिलाएँ व्रत रखती हैं और पूरे दिन बिना अन्न के रहती हैं। कुछ महिलाएँ सिर्फ फल और जल ग्रहण करती हैं।
– **पारंपरिक प्रसाद:** कमरछठ के दिन पारंपरिक प्रसाद जैसे चना, गेहूँ, दाल, और अन्य अनाजों से बने विशेष भोजन तैयार किए जाते हैं। इस प्रसाद को संतान के नाम पर देवी को अर्पित किया जाता है।
– **पूजा और अनुष्ठान:** शाम को महिलाएँ सामूहिक रूप से पूजा करती हैं। पूजा स्थल पर मिट्टी की देवी की प्रतिमा स्थापित की जाती है और उसके सामने हल, बेल, और खेत में उगने वाले अनाजों की पूजा की जाती है।
– **कथा सुनना:** पूजा के बाद महिलाएँ एक साथ बैठकर कमरछठ की कथा सुनती हैं, जिसमें इस पर्व के महत्व और देवी की कृपा की कहानियाँ सुनाई जाती हैं।
लोकगीत और परंपराएँ:
कमरछठ के दौरान महिलाएँ विशेष लोकगीत गाती हैं जो इस पर्व के महत्व को दर्शाते हैं। ये गीत पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा हैं और इन्हें गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ नई पीढ़ी को सिखाती हैं।
कमरछठ पर्व ग्रामीण जीवन, मातृत्व और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका और मातृत्व की महत्ता को भी रेखांकित करता है।।
कु. गीतांजलि पंकज


