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प्रशांत किशोर की बांकीपुर जीत से बिहार की राजनीति में भूचाल, भाजपा के गढ़ में सेंध से बदले समीकरण

विधानसभा के भीतर जन सुराज पार्टी का एकमात्र विधायक भी बाकी 242 विधायकों के संयुक्त प्रभाव से अधिक महत्व रखेगा। चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार में यह बात कही थी। अब नतीजे आ चुके हैं और बांकीपुर को नया विधायक मिलने जा रहा है। प्रशांत किशोर 18953 वोट से जीते हैं।

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में अब एक सीट जन सुराज की भी होगी। इस पर चुनावी डेब्यू करने वाले नेता प्रशांत किशोर विराजमान होंगे। चुनावी रणनीतिकार से खुद विधायक बने किशोर की यह जीत बिहार के राजनीतिक गलियारों से लेकर दिल्ली की बड़े मार्गों तक भी असर डाल सकती है। इस एक जीत ने एक ओर जहां जन सुराज में जान फूंक दी है। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड जैसी जमी हुई क्षेत्रीय पार्टियों की चिंता बढ़ाने का काम भी किया है। हालांकि, किसी नेता ने इसे लेकर कुछ कहा नहीं है।

प्रशांत किशोर बिहार में जीत, पर भाजपा पर दिल्ली तक असर

प्रशांत किशोर की यह जीत भाजपा के लिए हर तरफ से खतरे के संकेत हैं। पहली वजह है कि उन्होंने भाजपा के उस गढ़ को ढहाया है, जहां पार्टी का 1995 से कब्जा था। वहीं, दूसरी तरफ बात साख की भी है। क्योंकि यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने राज्यसभा जाने के बाद छोड़ी थी। अब उसी सीट को हारना, जिसे कुछ समय पहले जीता गया था। यह भाजपा के लिए बड़ा झटका होगा।

इसका असर नवीन तक नहीं, बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर भी पड़ सकता है। किशोर ने कहा था, ‘बांकीपुर के चार लाख मतदाता सिर्फ एक विधायक नहीं चुनेंगे। अगर मैं जीतता हूं तो सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा…।’ उन्होंने कहा था, ‘मुझे पता है कि यहां अधिकांश लोग सम्राट चौधरी से खुश नहीं हैं, लेकिन आप यह बात सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से नहीं कह सकते। मुझे वोट दीजिए, संदेश उन तक पहुंच जाएगा।’

खास बात है कि चौधरी के सीएम बनने के बाद राज्य में इतनी हाई प्रोफाइल सीट पर हार की चर्चा तो होगी। खासतौर से तब जब पार्टी राज्य में जदयू के साथ सरकार में है। हालांकि, भाजपा को बिहार विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला था। वहीं, दिग्गजों के प्रचार करने के बाद भी भाजपा की हार बदलते समीकरणों की ओर इशारा करेगी।

भाजपा झोंक चुकी थी पूरी ताकत

बिहार में इस सीट पर जीत के लिए एनडीए और महागठबंधन ने पूरी ताकत झोंकी थी। अध्यक्ष नवीन और सीएम चौधरी के अलावा केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, गिरिराज सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, नित्यानन्द राय,पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सहित कई मंत्री, सांसद, विधायक और एनडीए के प्रदेश अध्यक्षों ने प्रचार किया था।

जातिवाद की राजनीति पर झटका

किशोर पैदल यात्रा के समय से ही बिहार में जातिवाद की राजनीति पर सवाल उठा रहे हैं। इस चुनाव में भी उन्होंने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जर्जर बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दे उठाए थे। कहा जाता है कि राज्य की राजनीति लंबे समय से जातिवाद के नारे पर चलती है और यादव, मुस्लिम, दलित, भूमिहर जैसे नामों का जोर मतदान के समय नजर आता रहा है। कहा जा रहा है किशोर की जीत राज्य में जातिवाद की राजनीति अंत की शुरुआत या कम से कम चर्चा तो छेड़ ही सकती है।

बांकीपुर क्षेत्र में भूमिहार, राजपूत और ब्राम्हण मिल कर करीब 18 से बीस प्रतिशत मतदान का दम रखते हैं। यहां हुए पिछले 9 चुनावों में पांच बार भाजपा के अध्यक्ष नवीन और 4 बार उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा जीते हैं। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कायस्थ के साथ अन्य स्वर्ण जातियों, कुर्मी और कोइरी का एक जोड़ भाजपा के पक्ष में मतदान करता रहा है।

तेजस्वी यादव हो या निशांत कुमार, दोनों को मिला कॉम्पिटिशन

राज्य में तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, निशांत कुमार जैसे युवा नेताओं की चर्चा के बीच किशोर का झंडा गाड़ना कई क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती बन सकता है। पहला, तो इसके जरिए बिहार की राजनीति में एक और पार्टी विकल्प के तौर पर सामने आएगी। वहीं, लगभग हर पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर भी चोट पड़ने के आसार हैं।

किशोर ने कहा था, ‘जिन लोगों ने राष्ट्रीय जनता दल के सत्ता में आने पर ‘जंगलराज’ लौटने के डर से भाजपा को वोट दिया था, उन्हें अब चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि एनडीए को विधानसभा में भारी बहुमत प्राप्त है। जन सुराज की जीत से सरकार नहीं बदलेगी।’ वहीं मुस्लिम मतदाताओं से वह कहते हैं, ‘आप राजद को इसलिए वोट देते रहे कि भाजपा सत्ता से दूर रहे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बार बदलाव के लिए जन सुराज पार्टी को समर्थन दें।’

प्रशांत किशोर और जन सुराज की साख मजबूत होगी

बिहार विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरी जन सुराज एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी थी। 238 सीटों पर ही उसे हार का सामना करना पड़ गया था। अब इस जीत के साथ समीकरण बदल सकते हैं। एक ओर जहां जन सुराज एक बार फिर बिहार में चर्चा में आ जाएगी और खुद को विकल्प के तौर पर पेश करेगी। वहीं, पीके रणनीतिकार और स्टार प्रचारक के अलावा बिहार के एक मजबूत नेता को तौर पर स्थापित हो जाएंगे।

उनकी छवि मजबूत होने की एक वजह यह भी होगी कि उन्होंने भाजपा को घर में जाकर हराया। साथ ही उस सीट पर हराया, जहां कुछ महीनों पहले ही नवीन जीते थे।

क्षेत्रीय दल टूट सकते हैं

हार के बाद जन सुराज के कई नेताओं ने पाला बदला था। अब अगले विधानसभा चुनाव तक वैसा ही नजारा अन्य दलों में देखने को मिल सकता है, क्योंकि विधानसभा में अब जन सुराज की भी एक सीट है। इसका असर तेजस्वी की राजद, निशांत की जदयू और पहले से ही कमजोर नजर आ रही कांग्रेस पर हो सकता है। नया विकल्प मिलने के बाद कई दलों में भगदड़ की स्थिति बन सकती है। ऐसी ही स्थिति तमिलनाडु में देख चुके हैं, जहां सी जोसेफ की टीवीके के मजबूत होने के साथ ही कई पुराने गठबंधन टूट गए। कांग्रेस ने डीएमके से दूरी बना ली, भाजपा की साथी रही अन्ना द्रमुक के नेता पार्टी से छिटक गए, लेफ्ट ने नया साथी खोज लिया।

1995 में बदली कहानी अब 2026 में बदली

1957 में रामसरन साहू कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने जबकि 1962 में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। इस सीट पर 1967 का चुनाव सबसे दिलचस्प था, जब जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने कांग्रेस प्रत्याशी कृष्ण बल्लभ सहाय को हराया था। यही वह दौर था, जब बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और महामाया प्रसाद सिन्हा राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। बांकीपुर ने उस समय बिहार की बदलती राजनीति की पहली बड़ी तस्वीर दिखाई थी।

सीपीआई के एके सेन ने 1969 में, 1972 में भाकपा के ही सुनील मुखर्जी ने जीत दर्ज की। 1977 में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद, 1980 में इंदिरा कांग्रेस के रंजीत सिन्हा, 1985 और 1990 में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने यहां जीत दर्ज की। लेकिन इसके बाद से इस सीट की राजनीति पूरी तरह बदल गई। भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने 1995, 2000, 2005 फ़रवरी और अक्टूबर 2005 का चुनाव लगातार जीतकर पटना पश्चिम को भाजपा का मजबूत गढ़ बना दिया। व्यापारी वर्ग, शिक्षित मध्यम वर्ग और पारंपरिक भाजपा समर्थकों के बीच उन्होंने मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया।

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