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ई-जागृति: डिजिटल भारत में उपभोक्ता न्याय के लिए नई परिकल्पना

ई-जागृति: डिजिटल भारत में उपभोक्ता न्याय के लिए नई परिकल्पना

श्री प्रल्हाद जोशी

लेखक केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा तथा उपभोक्ता कार्य, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री हैं

न्याय में देरी, लंबे समय से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ी निराशाओं में से एक रही है। चाहे वह खराब उत्पाद हो, ऑनलाइन खरीदी गई वस्तु का न मिल पाना हो, या अनुचित सेवा अनुबंध हो, शिकायत दर्ज करने से लेकर राहत पाने तक की प्रक्रिया अक्सर धीमी, बोझिल और डराने वाली रही है। हालांकि, भारत की उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था समय के साथ लगातार विकसित हुई है, लेकिन इसे समर्थन देने वाली प्रणाली तेज़ी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के साथ कदम मिलाते हुए आगे नहीं बढ़ पायी।
आज, उपभोक्ता ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल भुगतान प्रणाली और ऑनलाइन बाज़ार में बड़े पैमाने पर लेन-देन करते हैं। उपभोक्ता न्याय की पारंपरिक व्यवस्था—जो भौतिक रूप से दाखिल करने, व्यक्ति द्वारा एक-एक कर जांच करने, अलग-अलग सॉफ़्टवेयर प्लेटफार्म का उपुओग करने और आमने-सामने की सुनवाई के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी—धीरे-धीरे अपर्याप्त सिद्ध होने लगी। डिजिटल युग में उपभोक्ता अधिकार सुनिश्चित करने के लिए केवल कानूनी सुधार ही पर्याप्त नहीं थे; इसके लिए न्याय देने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव करने की जरूरत थी।
यहीं पर ई-जागृति एक महत्वपूर्ण बदलाव लाती है। यह सिर्फ़ एक तकनीक प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था के केंद्र में पहुंच, पारदर्शिता और दक्षता को रखकर उपभोक्ता विवाद समाधान के तरीके की नए सिरे से परिकल्पना करने का प्रयास है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में एक आधुनिक फ्रेमवर्क की परिकल्पना की गयी थी, जो बाज़ार की उभरती वास्तविकताओं के अनुरूप काम करने में सक्षम हो। हालाँकि, कानून की भावना को प्रभावी सार्वजनिक सेवा में बदलने के लिए कई अलग-अलग पुरानी प्रणालियों को हटाकर एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम को अपनाने की जरूरत थी। पुराने प्लेटफॉर्म में एकरूपता की कमी, पुरानी संरचना, एक-दूसरे से जुड़कर काम करने की सीमित सुविधा और भौतिक प्रक्रियाओं पर अधिक निर्भरता जैसी समस्याएँ थीं। कई उपभोक्ताओं के लिए—विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन और अनिवासी भारतीय —न्याय पाने की प्रक्रिया की लागत अक्सर एक बड़ी बाधा बन जाती थी।
ई- जागृति उपभोक्ता शिकायत की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर इन संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करती है। ओटीपी आधारित पंजीकरण और ऑनलाइन दाखिल करने से लेकर डिजिटल जाँच, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, वर्चुअल सुनवाई, बहुभाषी आदेश और वास्तविक समय में मामले की निगरानी तक, यह प्लेटफ़ॉर्म नागरिकों को किसी भौगोलिक या प्रक्रियात्मक जटिलता की बाधा के बिना न्याय पाने में मदद करता है।
ऐसे बदलाव का महत्व केवल सुविधा तक ही सीमित नहीं है। यह नागरिकों और सार्वजनिक संस्थानों के बीच रिश्ते को मौलिक रूप से बदल देता है। डिजिटल वर्कफ़्लो कागजी काम को कम करते हैं, अलग-अलग अधिकार-क्षेत्रों में प्रक्रियाओं को एक जैसा बनाते हैं, विवेकाधीन देरी को कम करते हैं और पारदर्शिता बढ़ाते हैं। मामलों की स्वचालित सूची, ऑनलाइन डैशबोर्ड और तुरंत सूचना सुनिश्चित करती है कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान शिकायतकर्ता को हर जानकारी मिलती रहे, जिससे प्रणाली में जनता का भरोसा मजबूत होता है।
इस प्लेटफ़ॉर्म ने न्याय को और अधिक समावेशी बनाने के लिए उभरती तकनीकों को भी अपनाया है। एआई-सहायता प्राप्त मामला विश्लेषण, वॉइस-टू-टेक्स्ट कार्यप्रणाली, टेक्स्ट-टू-स्पीच सुविधा, बहुभाषी इंटरफेस, उन्नत सर्च क्षमता और पहुँच प्राप्त करने के उपकरण जैसी विशेषताओं के जरिए समाज के विभिन्न हिस्सों से अधिक लोगों की भागीदारी संभव हुई है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और राज्य उपभोक्ता आयोगों में हाइब्रिड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का देश भर में लागू होना भी उतना ही अहम रहा है, जिससे वर्चुअल सुनवाई उपभोक्ता न्याय दिलाने की प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा बन गई है। दूरदराज के जिलों या विदेशों में रहने वाले नागरिकों के लिए, इससे कानूनी लड़ाई की वित्तीय और लॉजिस्टिक लागत दोनों काफी हद तक कम हो गई हैं।
फिर भी, इस स्तर के तकनीकी बदलाव में चुनौतियाँ हमेशा मौजूद रहती हैं। डिजिटल सुधार अक्सर संस्थानों को स्थापित प्रथाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर करते हैं और उपयोगकर्ताओं को अपरिचित प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ई-जागृति की शुरुआत के दौरान, डेटा स्थानान्तरण, भुगतान गेटवे एकीकरण, इंटरफेस की उपयोगिता और लंबे समय से चल रहे मैनुअल प्रक्रियाओं में बदलाव को लेकर चिंताएँ उभरीं। कानूनी पेशेवरों और अन्य हितधारकों के कुछ हिस्सों ने नई डिजिटल व्यवस्था को अपनाते समय कुछ चिंताएं जाहिर कीं।
इन चिंताओं को बाधा मानने की बजाय, कार्यान्वयन प्रक्रिया ने उन्हें निरंतर सुधार के मौकों के तौर पर देखा। उपभोक्ता आयोगों, कानूनी पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श से इस प्लेटफ़ॉर्म को बेहतर बनाने में मदद मिली। नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रम, क्षेत्रीय कार्यशालाएं, वर्चुअल प्रशिक्षण सत्र, साप्ताहिक शिकायत निवारण संवाद और लगातार तकनीकी समर्थन से हितधारकों का नई प्रणाली में धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा। इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण सबक मिला: डिजिटल परिवर्तन केवल इसलिए सफल नहीं होता कि तकनीक लागू की गई है, बल्कि इसलिए सफल होता है, क्योंकि संस्थाएं उपयोगकर्ता की प्रतिक्रिया के प्रति संवेदनशील रहती हैं और निरंतर सुधार के लिए प्रतिबद्ध रहती हैं।
शुरुआती परिणाम उत्साहवर्धक हैं। थोड़े ही समय में, ई-जागृति ने लाखों उपभोक्ताओं को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला दिया है, दो लाख से अधिक मामलों के दाखिले की सुविधा दी है, उच्च समाधान दर हासिल की है और साठ से अधिक देशों के उपभोक्ताओं को भारत के उपभोक्ता विवाद निवारण व्यवस्था तक पहुंचने में सक्षम बनाया है। मानकीकृत डिजिटल वर्कफ़्लो ने दक्षता में सुधार किया है और उन प्रक्रियात्मक अड़चनों को कम किया है, जो पहले की प्रणाली की विशेषता थी।
राष्ट्रीय ई-शासन पुरस्कार 2026 में रजत पुरस्कार के माध्यम से मान्यता, न केवल एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में, बल्कि सरकारी प्रक्रिया की सफल पुनः डिज़ाइन की स्वीकृति के रूप में महत्वपूर्ण है। यह पुरस्कार इस बात को मान्यता देता है कि सार्थक डिजिटल शासन केवल मौजूदा प्रक्रियाओं को कंप्यूटरीकृत करने के बारे में नहीं है; यह उन्हें सरल, तेज़ और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए फिर से डिज़ाइन करने के बारे में है।
भारत की व्यापक डिजिटल इंडिया यात्रा ने दिखाया है कि जब मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता हो, तो तकनीक सार्वजनिक सेवा अदायगी को बदल सकती है। डिजिटल पहचान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से लेकर ऑनलाइन कराधान और स्वास्थ्य देखभाल प्लेटफार्मों तक, देश ने शासन में तकनीक की भूमिका का लगातार विस्तार किया है। अब उपभोक्ता न्याय भी उन क्षेत्रों की सूची में शामिल हो गया है, जिसमें संरचनात्मक डिजिटल सुधार हो रहे हैं।
‘ई-जागृति’ की सफलता भविष्य के शासन सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक देती है। डिजिटल प्लेटफार्मों को संस्थाओं के बजाय नागरिकों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। पहुंच को बाद में सोची जाने वाली बात के बजाय एक मूल सिद्धांत के रूप में लिया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को निष्पक्षता से समझौता किए बिना पारदर्शिता और कुशलता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर, तकनीक को न्याय को सरल बनाना चाहिए, न कि उसमें जटिलता की नई परतें जोड़नी चाहिए।
जैसे-जैसे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ती जा रही है, उपभोक्ता का विश्वास उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर अधिक निर्भर करेगा, जो उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करती हैं। प्रभावी विवाद समाधान अब केवल एक प्रशासनिक उद्देश्य नहीं रहा; यह एक आर्थिक आवश्यकता बन गया है, जो बाजारों में भरोसे को मजबूत करता है और जिम्मेदार व्यावसायिक प्रथाओं को बढ़ावा देता है।
ई-जागृति प्लेटफार्म दिखाता है कि सोच-समझकर किया गया डिजिटल बदलाव कानूनी इरादे और नागरिक अनुभव के अंतर को कम कर सकता है। उपभोक्ता न्याय को तेज़, अधिक पारदर्शी और अधिक समावेशी बनाकर, यह एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत करता है—कि डिजिटल लोकतंत्र में, न्याय तक पहुंच भी सेवा तक पहुंच जितनी ही सहज होनी चाहिए। यही शायद इक्कीसवीं सदी में “ग्राहक देवो भव” का सबसे सार्थक रूप है।Y

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