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रायपुर में बारिश कम पड़ती है, कचरा ज़्यादा बरसता है।

 

उमावाणी

इसे कूड़ेदान समझने की भूल मत करना… यह रायपुर की नाली है!

रायपुर में बारिश कम पड़ती है, कचरा ज़्यादा बरसता है।

यह आज रायपुर की नाली, नाला, तालाब के किनारे की स्थिति है ,यह फोटो किसी कूड़ाघर की नहीं है। यह शहर की नाली है, तालाब का किनारा है और नालों की असलियत है। जिन रास्तों से बारिश का पानी निकलना चाहिए, वहां पॉलीथीन, प्लास्टिक, थर्माकोल और कचरे ने स्थायी कब्जा कर लिया है।

कागज़ों में सिंगल यूज़ पॉलीथीन प्रतिबंधित है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हर घंटे, हर दिन, हर महीने ट्रकों के हिसाब से प्लास्टिक शहर की नालियों और तालाबों में पहुंच रही है। लगता है प्रतिबंध केवल सरकारी फाइलों में है, बाजार में नहीं। खुलेआम शब्जी बाजार में ठेले में , दुकानों में प्लास्टिक दिया जा रहा है , व्यापारी घूम घूम कर प्लास्टिक बेचा रहे है । फेक्टरी वाले रोज ट्रको ट्रक सिंगल यूज पॉलीथिन बना रहे हैं? कोई माई का लाल है जो इसे पकड़ सके । जिन्हें नाली साफ करना है वे भी वैसे ही है , नाली से कचरा निकलता ही कब है ,झाड़ू वाले भी सड़क का कचरा नाली में डाल देते है । फिर बारिश आते ही वही घिसा-पिटा संवाद शुरू हो जाता है—
“अरे… शहर डूब गया!”
शहर नहीं डूबा जनाब, हमारी सोच डूब गई है।

जिस नाली को निगम ने साफ नहीं किया हमने कूड़ेदान बना दिया, जिस नाले को प्लास्टिक गोदाम बना दिया, जिस तालाब को कचरा घर बना दिया… वहां पानी कहा रहेगा पानी सड़क में नहीं बहेगा तो क्या हेलीकॉप्टर से उड़कर जाएगा?

फिर शुरू होती है महान परंपरा—दोषारोपण की।
कोई नगर निगम को कोसता है, कोई सरकार को, कोई मौसम विभाग को और कोई बादलों को। जिसने सुबह घर का कचरा चुपचाप नाली में फेंका था, वह सबसे आगे खड़ा होकर प्रशासन को ज्ञान देता है।

सच्चाई कड़वी है…
नालियां बारिश से नहीं, हमारी आदतों से जाम होती हैं। और जब नालियां जाम होंगी तो सड़कें ही नाले बनेंगी, गाड़ियां नाव बनेंगी और फिर सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर लिखा जाएगा—”देखिए, विकास बह रहा है!”
जब तक पॉलीथीन बनाने वाले ,बेचने वाले , सामान देने वाले , नालियों में फेंकने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी और नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक हर बरसात में यही नाटक चलता रहेगा।

पहले नाली में कचरा डालो… फिर सड़क पर पानी देखकर गाली दो।शायद यही नया शहरी संस्कार बन गया है।
याद रखिए… पानी अपना रास्ता नहीं भूलता, हम उसका रास्ता बंद कर देते हैं।

( मनोज शुक्ला )

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