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केन-बेतवा प्रोजेक्ट के खिलाफ छतरपुर में 15 दिन से भूख हड़ताल, जल-चिता सत्याग्रह से क्यों गरमाया आंदोलन?

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को लेकर विरोध तेज हो गया है। जहां देश की राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर एक अलग मुद्दे को लेकर भूख हड़ताल जारी है, वहीं छतरपुर में कई लोग पिछले 15 दिनों से इस बड़े सरकारी प्रोजेक्ट के विरोध में अनशन पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परियोजना से प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और विस्थापन की प्रक्रिया पूरी तरह संतोषजनक नहीं है।

छतरपुर में चल रहे इस आंदोलन ने अब अलग-अलग विरोध के तरीकों के कारण भी ध्यान खींचा है। प्रदर्शनकारी जल सत्याग्रह, चिता सत्याग्रह और सांकेतिक फांसी जैसे तरीकों से अपनी मांगों को सामने रख रहे हैं।

15 दिन से जारी है भूख हड़ताल

छतरपुर के कुपी गांव के पास बराना नदी किनारे कुछ लोग केन-बेतवा परियोजना के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, उनकी मुख्य मांग प्रभावित परिवारों के उचित पुनर्वास और विस्थापन से जुड़ी समस्याओं का समाधान है।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले कई दिनों से अनशन पर हैं। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का आरोप है कि प्रशासन की ओर से उनकी स्वास्थ्य जांच नियमित रूप से नहीं की जा रही है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि:

  • प्रभावित परिवारों को पर्याप्त पुनर्वास सुविधाएं नहीं मिली हैं।
  • विस्थापन के बाद आजीविका की समस्या बनी हुई है।
  • परियोजना से पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर असर पड़ सकता है।

अनोखे तरीके से विरोध कर रहे ग्रामीण

केन-बेतवा परियोजना के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने कई प्रतीकात्मक तरीके अपनाए हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • जल सत्याग्रह: पानी में खड़े होकर विरोध प्रदर्शन।
  • चिता सत्याग्रह: चिता पर लेटकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास।
  • सांकेतिक फांसी प्रदर्शन: महिलाओं द्वारा गले में रस्सी डालकर विरोध दर्ज कराना।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य सरकार तक अपनी समस्याएं पहुंचाना है और वे चाहते हैं कि प्रभावित लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जाए।

क्या है केन-बेतवा रिवर लिंक प्रोजेक्ट?

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना है, जिसे नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान के तहत विकसित किया जा रहा है।

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य:

  • केन नदी के अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी तक पहुंचाना।
  • बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाना।
  • मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखा प्रभावित इलाकों में पेयजल उपलब्ध कराना।

इस परियोजना को बुंदेलखंड के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पर्यावरण को लेकर भी उठे सवाल

परियोजना को लेकर केवल विस्थापन ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

कुछ पर्यावरण संगठनों और प्रभावित लोगों का कहना है कि परियोजना से जंगलों और वन्यजीवों पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र को लेकर चिंताएं जताई गई हैं।

वहीं सरकार का पक्ष रहा है कि परियोजना से क्षेत्र में जल संकट दूर होगा और किसानों को बड़ा लाभ मिलेगा।

क्यों बढ़ रहा है विवाद?

केन-बेतवा परियोजना को लेकर विवाद का मुख्य कारण विकास और विस्थापन के बीच संतुलन को लेकर है। जहां सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए जीवन बदलने वाली योजना बता रही है, वहीं प्रभावित परिवार बेहतर पुनर्वास और अपनी समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं।

अब नजर इस बात पर है कि प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत से कोई समाधान निकलता है या आंदोलन आगे भी जारी रहता है।

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