
अबूझमाड़ के 14 कड़े गांवों के लिए ITBP के लकड़ी के पुल बने संजीवनी
रायपुर, सालों से लाल आतंक के साए में कटे और विकास की मुख्यधारा से दूर रहे नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के 14 दूरस्थ गांवों के लिए इस बार का मानसून एक नई उम्मीद लेकर आया है। उफनती नदियों और नालों के कारण बरसात में दुनिया से पूरी तरह कट जाने वाले इन गांवों को जोड़ने के लिए 44 वीं वाहिनी आईटीबीपी (ITBP) के जवानों ने लकड़ी के अस्थायी ‘फुट ब्रिज’ (पैदल पुल) तैयार कर ग्रामीणों को बड़ी राहत दी है।
*36 सालों का दंश और ओरछा से टूटता संपर्क*
वर्ष 1990 के दशक से अत्यधिक नक्सली प्रभाव के कारण इस अंदरूनी इलाके में सड़क और स्थायी पुल-पुलियों जैसी मूलभूत सुविधाओं का निर्माण एक बड़ी चुनौती बना रहा। हर साल बारिश के मौसम में नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने से 14 गांवों का ओरछा मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह टूट जाता था। इसके चलते ग्रामीणों के सामने स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और दैनिक जरूरतों के लिए आवाजाही करना जान जोखिम में डालने जैसा था।
*जवानों का मानवीय चेहरा: सुरक्षा के साथ सुगम यातायात*
क्षेत्र में 44वीं वाहिनी आईटीबीपी द्वारा सुरक्षा कैंप स्थापित किए जाने के बाद जवानों ने न केवल सुरक्षा का माहौल बनाया, बल्कि ग्रामीणों की इस पुरानी पीड़ा को समझा। जवानों ने स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर रणनीतिक स्थानों पर मजबूत लकड़ी के अस्थायी फुट ब्रिज बनाए हैं। अब इन पुलों के जरिए ग्रामीण बरसात में भी पैदल और दोपहिया वाहनों से सुरक्षित रूप से ओरछा आ-जा सकेंगे।
*अस्थायी लकड़ी के ब्रिज ग्रामीणों के लिए लाइफलाइन*
सेनानी, 44वीं वाहिनी आईटीबीपी के सिद्धिक पी. पी.ने कहा कि हमारी प्राथमिकता केवल सुरक्षा प्रदान करना ही नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिकों के जीवन को सुगम बनाना भी है। जब तक स्थायी सड़क और पुलों का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक ये अस्थायी लकड़ी के ब्रिज ग्रामीणों के लिए लाइफलाइन का काम करेंगे।
*ग्रामीणों ने जताया आभार*
दशकों बाद बारिश के दिनों में भी सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलने पर स्थानीय ग्रामीणों ने आईटीबीपी के इस मानवीय प्रयास की सराहना की है। ग्रामीणों का कहना है कि इन पुलों ने उनकी मुश्किलों को आसान कर दिया है और अब आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचना या राशन लाना संभव हो सका है।




