


नई दिल्ली। भाजपा प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया की ओर से दायर मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं को सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कड़ी मौखिक नसीहत दी। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना जरूरी है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की अदालत में हुई। गौरव भाटिया ने CJP से जुड़े अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ 2 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर किया है।
कोर्ट ने पूछा- अभिजीत दीपके को आरोपी क्यों बनाया?
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने गौरव भाटिया से सीधे सवाल किया कि मामले में CJP नेता अभिजीत दीपके का नाम प्रतिवादी के तौर पर क्यों शामिल किया गया है।
दीपके की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उन्होंने गौरव भाटिया से संबंधित कोई सोशल मीडिया पोस्ट नहीं किया है। ऐसे में उन्हें मामले से बाहर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने भी इस बिंदु पर सवाल उठाया कि जब दीपके की ओर से कथित विवादित पोस्ट नहीं किया गया, तो उन्हें याचिका में पक्षकार बनाने का आधार क्या है।
क्या है पूरा विवाद?
मामला एक कथित फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है। गौरव भाटिया ने 5 सितंबर को एक्स पर सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से किए गए एक पोस्ट पर आपत्ति जताई थी।
यह पोस्ट CJP के एक नाबालिग प्रदर्शनकारी पर कथित हमले के आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी के बाद सामने आया था।
भाटिया की याचिका के मुताबिक, संबंधित पोस्ट AI की मदद से तैयार किया गया कथित फर्जी ट्वीट था। इसमें गौरव भाटिया के नाम से यह दावा किया गया था कि उन्होंने स्वतंत्र भारद्वाज को ‘दिमागी नक्सली’ और ‘जातिवादी’ कहा था।
भाटिया का आरोप है कि उन्होंने इस तरह का कोई बयान दिया ही नहीं था। उनका कहना है कि यह मामला केवल किसी बयान की आलोचना का नहीं, बल्कि उन्हें ऐसे कथित बयान से जोड़ने का है, जो उन्होंने कभी दिया ही नहीं।
कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट पर क्या कहा?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने सुनवाई के दौरान कहा कि विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी व्यक्ति पर इस तरह हमला करना उचित नहीं है।
अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका से अपने स्तर पर विवादित पोस्ट हटाने पर विचार करने को कहा।
सौरव दास की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि संबंधित ट्वीट पहले ही डिलीट किया जा चुका है। इस पर अदालत ने कहा कि एक अन्य सामग्री भी पोस्ट की गई थी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन अपनी बात इस तरह रखी जानी चाहिए कि उसका आशय और मंशा स्पष्ट रहे।
युवा नेताओं को कोर्ट की सलाह
सुनवाई के दौरान अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि दोनों अभी युवा हैं और उनके सामने लंबा करियर है।
अदालत ने संकेत दिया कि विवाद को उचित तरीके से सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए, ताकि अनावश्यक रूप से अदालतों में समय न बिताना पड़े।
कोर्ट ने दोनों नेताओं के वकीलों से अपने मुवक्किलों से निर्देश लेने और अगली सुनवाई में यह बताने को कहा कि क्या वे विवादित पोस्ट हटाने और अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए तैयार हैं।
गौरव भाटिया ने कहा- यह गंभीर मानहानि का मामला
सुनवाई के दौरान गौरव भाटिया ने अदालत के सामने कहा कि मामला ‘गंभीर मानहानि’ से जुड़ा है और ऐसी सामग्री इंटरनेट पर मौजूद नहीं रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट्स के लाखों फॉलोअर्स हैं। ऐसे में किसी फर्जी सामग्री के प्रसार से उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है।
भाटिया ने यह भी दावा किया कि उन्होंने संबंधित लोगों को पोस्ट हटाने और विवाद सुलझाने का अवसर दिया था, लेकिन मामला अदालत तक पहुंचा।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी तस्वीर के साथ छेड़छाड़ की गई और पोस्ट को विश्वसनीय दिखाने के लिए उस पर एक समाचार एजेंसी का लोगो भी लगाया गया।
कोर्ट ने गौरव भाटिया को भी दी सलाह
दिल्ली हाई कोर्ट ने केवल CJP नेताओं को ही सलाह नहीं दी, बल्कि गौरव भाटिया को भी मामले से निपटने के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने को कहा।
अदालत ने कहा कि मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए सीधे अदालत आने से पहले संबंधित लोगों से संपर्क कर विवाद को सुलझाने की कोशिश की जा सकती थी।
इससे संकेत मिलता है कि कोर्ट फिलहाल विवादित सामग्री को हटाने और पक्षों के बीच मामले को सुलझाने की संभावना पर भी विचार कर रहा है।
2 करोड़ रुपये का है मानहानि दावा
गौरव भाटिया की ओर से दायर याचिका में 2 करोड़ रुपये की मानहानि का दावा किया गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि CJP और उससे जुड़े नेताओं की ओर से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे बयान और पोस्ट किए गए, जिनसे न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का आरोप है।
याचिका में सौरव दास की कुछ अन्य सोशल मीडिया पोस्ट का भी उल्लेख किया गया है। इनमें न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ कथित टिप्पणी और उमर खालिद की कैद से संबंधित पोस्ट का हवाला शामिल है।
फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट ने संबंधित पक्षों को अपने-अपने निर्देश लेने और अगली सुनवाई में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अब आगे की सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि विवादित पोस्ट हटाए जाते हैं या नहीं और अभिजीत दीपके को मामले में पक्षकार बनाए रखने का क्या आधार सामने आता है।




