
उमावाणी न्यूज
राज्योत्सव विशेष रूपक-
छत्तीसगढ़ का छब्बीस वर्ष कला-साहित्य का अभूतपूर्व सफर

विश्व के मानचित्र पर सभ्यता- संस्कृति की दृष्टि से छत्तीसगढ़ जगमगाता हुआ राज्य है। इसके बहुत बड़े हिस्से में जनजातीय समुदाय निवास करते हैं।जनजातियों सहित, लोक कलाओं का विकास नवगठित राज्य में काफी तेजी से हुआ है। राज्य गठन के पूर्व लोक कलाकारों- संस्कृति को संरक्षित एवं संवर्धन करने का कार्य करने वालों में दाऊ दुलार सिंह मंदरा जी, दाऊ रामचंद्र देशमुख,और दाऊ महासिंग चंद्राकर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।छत्तीसगढ़ी लोक गाथा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का श्रेय हबीब तनवीर को जाता है। शास्त्रीय संगीत- नृत्य “रायगढ़ शैली” की शुरुआत करने में रायगढ़ के महाराजा चक्रधर सिंह का नाम स्मरणीय है। राज्यगठन पूर्व से ही खैरागढ़ में विश्वप्रसिद्ध राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय स्थापित है।ऐसी कला समृद्धि के बावजूद राज्य गठन के पूर्व भारत सरकार की ओर से देय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री, पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण से अलंकृत होने वालों में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों -कलाकारों की संख्या नाममात्र की रही,जो कि समृद्ध धरा की अनदेखी का प्रत्यक्ष प्रमाण है,जहां कि सीता बेंगरा सरगुजा की पहाड़ियों पर विश्व की प्रथम नाट्यशाला होने का डंका बजता है।चंदखुरी रायपुर को प्रभु श्रीराम की जननी माता कौशिल्या का मायका कहा जाता है। श्रीराम के चौदह वर्षीय वनवास काल में अत्यधिक समय बिताने की बात कही जाती है। घोर उपेक्षाओं का दंश झेलते हुए छत्तीसगढ़ को 1 नवम्बर 2000 में स्वतंत्र राज्य ह का दर्जा मिला।तब यहां की विभूतियां के लिए विराट द्वार खुला। आज गिनती करें सर्वोच्च नागरिक सम्मान में शामिल पद्मश्री, पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण से छत्तीसगढ़ के दो दर्जन से अधिक हस्तियां को विभूषित होने का गौरव प्राप्त है। बड़ी संख्या में साहित्य-कला जगत की विभूतियों का सम्मान स्पष्ट संकेत दे रहा है कि राज्य गठन के पूर्व यहां जागरूकता की अथवा प्रशासनिक दृष्टि से ईमानदार कोशिश की सर्वथा कमी थी। राज्यगठनोपरांत पद्म पुरस्कार का सिलसिला आरंभ हुआ, जो कि सतत जारी है। पंडवानी गायिका पद्मश्री डॉ तीजन बाई को 2003 में पद्मभूषण एवं 2019 में पद्म विभूषण से अलंकृत होने का गौरव प्राप्त हुआ।पंडवानी गायक पुनाराम निषाद 2005 में, डॉ.महादेव प्रसाद पांडे 2007 साहित्य शिक्षा, मार्टिन नेल्सन मूर्ति कला 2008 में, लोकनाट्य कला नाचा हेतु गोविंद निर्मलकर 2009 में, साहित्य- शिक्षा हेतु डॉ सुरेंद्र दुबे 2010 में, स्वामी जीसीडी भारती बंधु 2013 कबीर भजन सूफी गायन हेतु सम्मानित हुए।आगे रामानुज अनुज शर्मा 2014 , लोक गायन हेतु ममता चंद्राकर 2016, साहित्य शिक्षा हेतु पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी 2018 में, बस्तर लोक वाद्यों के संवर्धन (बस्तर बैंड) हेतु अनूप रंजन पांडे 2019 में,सूफी गायन हेतु मदन सिंह चौहान 2020 में, राधेश्याम बारले पंथी नृत्य में 2021,उषा बारले पंडवानी गायन 2023, लोकनाट्य नाचा हेतु डोमार सिंह कंवर 2023 में, काष्ठ कला हेतु अजय कुमार मंडावी 2023 में,शास्त्रीय नृत्य कला हेतु रामलाल बरेठ 2025 में, पारंपरिक लोक वाद्यों के निर्माण हेतु पंडित राम मांडवी 2025 मे पद्मश्री से अलंकृत हुए।साहित्य जगत की सबसे बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई जब विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार 2024 से विभूषित हुए। वे छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार हैं।विदित हो कि ज्ञानपीठ पुरस्कार देने में राज्य- केंद्र सरकार की भूमिका नहीं होती ।राज्य में साहित्य- कला जगत की विभूतियों को चौदह विधाओं में पुरस्कार देने की पहल हुई है। कला क्षेत्र में हबीब तनवीर,खुमान साव, लक्ष्मण मस्तुरिया, तीजनबाई पुरस्कार देने की शुरुआत हुई। हालांकि इन्हें आगे बढ़ाने और प्रदेश में सांस्कृतिक क्रांति लाने वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्राकर को विस्मृत कर दिया गया है। इनके नाम से पुरस्कार देने की घोषणा राज्योत्सव में करना चाहिए। सतीश जैन की फिल्म “मोर छइहां भुइयां” तथा राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत मनोज वर्मा की फिल्म ‘भूलन कांदा’ के बाद फिल्म जगत में बड़ी प्रगति हुई।शासन द्वारा राज्य -राष्ट्रीय स्तर पर किशोर साहू सम्मान देने और फिल्म विकास निगम का गठन किया गया। नवा रायपुर में बृहदाकार मुक्तांगन, आदिवासी संग्रहालय का निर्माण हुआ और “चित्रोत्पला” फिल्म सिटी निर्माण जारी है। प्रदेश के अशक्त निर्धन कलाकारों कलमकारों को आर्थिक सहायता- पेंशन देने की सराहनीय पहल हुई । यहां की कलाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए अधिक कारगर प्रयास की अपेक्षा सरकार से है।
विजय मिश्रा ‘अमित’
