
उमावाणी न्यूज
17सितम्बर विश्वकर्मा जयंती विशेष आलेख-
कामगारों का सम्मान ही है भगवान विश्वकर्मा की सच्ची पूजा
बस में बैठ कर रायपुर से बिलासपुर जा रहा था। तभी सिमगा के पास पहुंचते पहुंचते बस के इंजिन में कुछ खराबी आ गई।ड्राइवर पाना पेचिस लेकर उतरा और इंजिन को सुधारने लगा। कन्डेक्टर ने बताया कि गड़बड़ी सुधारने में आधा एक घंटा लग सकता है। यह सुनकर मैं बस से उतरकर टहलने लगा। तभी मैंने देखा सामने ही बने बने पंडाल में भगवान विश्वकर्मा जी विराजमान हैं।
पंडाल के करीब जाकर मैंने भगवान विश्वकर्मा जी का चरण स्पर्श किया और हठी बालक की तरह बोला- आप तो कल,पुर्जे , मशीनों के देवता हैं।जनक हैं। बताइए तो भला क्या नाराजगी हो गई जो आपने हमारी बस के इंजिन में खराबी ला दी?
मेरे इस सवाल को सुनकर विश्वकर्मा भगवान खिलखिला कर हंस पड़े, फिर बोले – सुनो विजय बाबू, इंसानों की जिंदगी में सुख सुविधाओं को बढ़ाने सहित तरक्की लाने के लिए मैंने विविध कल- पुर्जे- और मशीनों का निर्माण किया। किन्तु मनुष्य तो दिन ब दिन मशीनों का गुलाम- दास बनते कामचोर -आलसी होते जा रहा है।ऐसी कामचोरी की आदत के चक्कर में बस ड्राइवर ने बस इंजिन की देख-रेख नहीं की होगी।ऐसे में तो मशीनों में गड़बड़ी आएगी ही न।
अच्छा अच्छा ए बात हे। कहते हुए मैंने आगे बात बढ़ाई- आज तो दुनिया भर में विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। हे देव,आपको जन्मदिवस की हार्दिक बधाई देते विनती कर रहा हूं अपनी जन्म – जिन्दगी की कथा सुनाएं तो समय का सदुपयोग हो जाएगा और मेरे ज्ञान में वृद्धि भी हो जाएगी।
दुनिया का पहला अभियंता
तब भगवान विश्वकर्मा ने कहा- जो भी समय का सदुपयोग करना जानता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है। मुझे अच्छा लगा कि तुम समय के पुजारी हो और मेरे बारे में जानने उत्सुक हो। सुनो, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी के वंशज हमारे खानदान हैं। मेरे जनक वास्तुदेव और जननी अंगिरसी हैं। विश्वकर्मा दो अक्षरों से मिलकर बना है। विश्व अर्थात दुनिया और कर्मा अर्थात कार्य करना,नव सृजन करना। इन अर्थों में दुनिया को तेजी से गढ़ने और बढ़ाने का दायित्व देवगण ने मुझे सौंपा है।
सृष्टि के कुशल संचालन और मानव सहित जीव -जंतुओं की जिंदगी की आवश्यकताओं के अनुरूप सर्वप्रथम कल- कारखाना, घर-द्वार,,मोटर- गाड़ी,का सृजन मेरे ही हाथों हुआ है।
ओहो ……। इसीलिए आपको देवी- देवताओं का इंजीनियर, कल-पुर्जों के देवता और दुनिया का पहला अभियंता कहा जाता है। कहते हुए मैंने कहा-हे देव,अपने खास खास कामकाज, सृजनों की जानकारी भी दें तो मेरे ज्ञान में और अधिक वृद्धि होगी।
मजदूरों का सम्मान ही असली पूजा
तब विश्वकर्मा जी थोड़ी देर तक आंखें बंद कर के सोचने के बाद बोले- भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका नगरी,पांडवों के हस्तिनापुर और माया सभा इंद्रप्रस्थ, दशानन रावण की स्वर्ण नगरी लंका,पुष्पक विमान, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र,भोलेनाथ का त्रिशूऔर इन्द्र देव का वज्र जैसे अनेक नगर,महल, औजार,अस्त्र-शस्त्र का निर्माण मेरे ही हाथों हुआ है। भूलोक में बढ़ई, सोनार ,लोहार, कसेर, मूरतीकार मेरे ही वंशज हैं।
बदलते हुए वक्त के साथ साथ बढ़ती आवश्यकताएं,बढ़ते ज्ञान विज्ञान के बूते दुनिया में अत्याधुनिक अविष्कार आए दिन हो रहे है किंतु उसके मूल में मेरे साथ ही मेरे सिपाहियों -कारीगिरों का प्रताप समाया हुआ है। सृष्टि के सभी कारीगिरों- मजदूरों को मैं अपना परिवार अपना सिपाही मानता हूं। मेरी जयंती तिथि पर गाड़ी- घोड़ा कल-कारखानों की साफ-सफाई सजावट के साथ साथ जो भी व्यक्ति मेरे सिपाहियों का सम्मान करता है उसे सतत तरक्की का आशीष मैं देता हूं।गरीब मजदूरों-कारीगिरों के मान- सम्मान को ही अपनी असली पूजा मानता हूं।
बेटी- बेटा में भेद-भाव अनुचित
वाह भगवन, बस इंजिन में आई खराबी तो आज मेरे लिए वरदान बन गई है।आपसे ज्ञान पाने का सुअवसर मिल गया है।मेरी लालसा बढ़ती ही जा रही है कहते हुए मैंने धीरे से कहा- आप तो देवपुरूष हैं। कहते हैं कि हर पुरुष की तरक्की के पीछे किसी नारी शक्ति का हाथ होता है तो आपकी तरक्की में किनका साथ है?
मेरे इस प्रश्न पर हल्की मुस्कान लिए वे बोले- मेरी जीवनसंगिनी सौम्या देवी है। हमारी छै बिटिया हैं।जिनके नाम चित्रंगदा, रिद्धि -सिद्धि,संज्ञा,बर्हिष्मति,रन्ना देवी हैं। हमारे पांच बेटे मनु, त्वष्टा, मय,सिल्पी,देवग्य हैं।
वाह।आपका तो बड़ा भरा पूरा परिवार है प्रभू जी। ए बताएं कि बेटी- बेटा में बढ़िया कौन होता है?। मेरे इस सवाल के जवाब को कड़क लहजे में देते हुए विश्वकर्मा जी ने कहा- देखो,ऐसे नासमझी पूर्ण भेद-भाव मन में रखना अनुचित है। सदैव याद रखना कि दोनों के बिना दुनिया नहीं चल सकती। बेटी- बेटा में भेद-भाव रखने वाला घोर पाप का भागीदार होता है।समझे न।
सही बात है प्रभू जी। मुझे क्षमा करें।इतना कह पाया था तभी बस घरर घरर करते चालू हो गई। कन्डेक्टर भी चलो चलो चिल्लाने लगा।उसे सुनकर मैंने विश्वकर्मा भगवान के चरण छुए और विदा लेकर बस में जा बैठा।

विजय मिश्रा ‘अमित’
अग्रोहा कॉलोनी रायपुर (छग)