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जंग की मार: डिटर्जेंट उद्योग पर भारी पड़ रहा ईरान-इजरायल संकट, 90% इकाइयों में उत्पादन बंद

कानपुर, झाग से भरे टब और मशीनों की गूंज से गुलजार रहने वाली डिटर्जेंट फैक्ट्रियां खामोश हैं। कई इकाइयों में कच्चा माल नहीं है और जहां है, वहां उसकी कीमत ने कारोबारियों की कमर तोड़ दी है। करीब 90 फीसदी इकाइयों में काम ठप है या बेहद सीमित स्तर पर सिमट गया है। कभी स्थिर व भरोसेमंद मानी जाने वाली यह इंडस्ट्री अब अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रही है।

कानपुर और कानपुर देहात में फैली 500 से अधिक डिटर्जेंट इकाइयों पर संकट गहराता जा रहा है। उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले कच्चे माल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने उत्पादन व्यवस्था को तगड़ा झटका दिया है। ईरान-अमेरिका के बीच संघर्ष के कारण क्रूड ऑयल की कमी ने उद्यमियों को पीछे धकेल दिया है। पॉलिमर की कीमत महीनेभर में 68 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 93 रुपये तक पहुंच गई है, वहीं सोडा भी साढ़े 26 रुपये से करीब 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।

सर्वाधिक परेशानी लेप्सा के रेट के चलते

डिटर्जेंट इकाइयों पर सबसे ज्यादा मार लेप्सा के दामों ने मारी है। जंग के कारण इसकी कीमत 140 रुपये प्रति किलो से बढ़कर सीधे 250 रुपये तक पहुंच गई है। जानकार बताते हैं कि इस केमिकल के बिना डिटर्जेंट बनाना लगभग असंभव है। ऐसे में उत्पादन लागत इतनी बढ़ गई है कि छोटे और मध्यम स्तर के कारोबारी बाजार में टिक नहीं पा रहे। पनकी, दादा नगर, फजलगंज रनियां जैसे औद्योगिक इलाकों में कई यूनिट्स के शटर आधे गिरे हुए हैं। करीब 10 फीसदी बड़ी इकाइयां ही किसी तरह उत्पादन जारी रखे हुए हैं, वह भी सीमित स्तर पर काम कर रही हैं।

बचत छोड़िए लागत निकालना भी हो रहा मुश्किल

पीआईए के प्रांतीय कोषाध्यक्ष व डिटर्जेंट उद्यमी भगवान दास शिवानी का कहना है कि लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में कीमत बढ़ाना आसान नहीं है, क्योंकि बड़े ब्रांड्स से प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। मार्जिन खत्म हो गया है और कई इकाइयां घाटे में हैं। अब लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

छंटनी की तैयारी शुरू

इस संकट का असर सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कामगारों की रोजी-रोटी पर भी सीधा खतरा मंडरा रहा है। उद्यमी प्रकाश अंशवानी कहते हैं कि कई इकाइयों में काम घटने के चलते छंटनी की तैयारी शुरू हो चुकी है। मजदूरों को या तो कम दिन काम दिया जा रहा है या फिर उन्हें छुट्टी पर भेजा जा रहा है। करीब 4000 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाला यह उद्योग सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। सरकार कच्चे माल की कीमतों पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए और छोटे उद्योगों को राहत पैकेज दे, ताकि यह पारंपरिक उद्योग पूरी तरह खत्म होने से बच सके।

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