रायपुर

नेमीनाथ: त्याग, करुणा और आत्मज्ञान की जीवंत मिसाल — पूज्य श्री हंसकीर्ति श्रीजी

आत्मोत्थान चातुर्मास 2025

नेमीनाथ: त्याग, करुणा और आत्मज्ञान की जीवंत मिसाल — पूज्य श्री हंसकीर्ति श्रीजी

रायपुर। श्री जिनकुशल सूरी दादाबाड़ी में आत्मोत्थान चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में बुधवार को परम पूज्य हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. ने धर्मरत्न प्रकरण ग्रंथ का वाचन करते हुए आत्मा की शुद्धता, त्याग और आत्मज्ञान के महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला।

साध्वीश्री ने कहा— “जीवन को जागरूकता और स्वीकार्यता के साथ जीना ही परमात्मा की ओर अग्रसर होने का सच्चा मार्ग है।” जब आत्मा सत्य के मार्ग पर चलती है, तो वह संसारिक मोह, भ्रम और बंधनों से स्वतः मुक्त हो जाती है।

प्रवचन के दौरान भगवान नेमीनाथ के जीवन प्रसंग का मार्मिक उल्लेख हुआ। उन्होंने बताया कि एक बार नेमीकुमार आयुधशाला में पहुंचे और खेलते-खेलते शंख बजाया। शंख की गंभीर ध्वनि से ब्राह्मण विचलित हो गए, समुद्र में हलचल उत्पन्न हो गई, देवगण भयभीत हो उठे, और हाथियों में भगदड़ मच गई। यहाँ तक कि श्रीकृष्ण भी इस ध्वनि से चकित और भयभीत हो गए।

जब ज्ञात हुआ कि यह प्रभाव स्वयं नेमीकुमार के शंखनाद का परिणाम है, तब श्रीकृष्ण ने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने की ठानी। उन्होंने अपनी भुजाएं फैलाकर नेमीकुमार को आमंत्रित किया, परंतु नेमीकुमार ने सहज भाव से उनकी भुजा को नीचे कर दिया। यह देख स्वयं श्रीकृष्ण भी उनके अद्वितीय तेज और सामर्थ्य से अभिभूत हो उठे।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने उन्हें गृहस्थ जीवन अपनाने का प्रस्ताव रखा। राजपरिवार में विवाह की तैयारी आरंभ हुई, माता ने वधु देखने की इच्छा प्रकट की और रानियों ने योग्य कन्या की खोज की। नेमीकुमार की बारात पूरे राजकीय वैभव के साथ सजाई गई। लेकिन जैसे ही बारात राजीमति के नगर पहुंची, एक करुण दृश्य नेमीकुमार के अंतर्मन को झकझोर गया।

उन्होंने देखा कि बारात के भोजन के लिए जहां पकवान बन रहे थे, वहीं अनेक पशुओं को बांधकर भूखा रखा गया था, जो पीड़ा से कराह रहे थे। यह दृश्य देखकर उनके अंत:करण में करुणा की तीव्र लहर दौड़ गई। उन्होंने चिंतन किया कि ऐसा विवाह जिसमें किसी जीव की पीड़ा हो, वह कभी भी धर्मसम्मत नहीं हो सकता।

यहीं से उनके जीवन की दिशा परिवर्तित हो गई। उन्होंने संसारिक बंधनों से मुक्त होकर आत्म-मार्ग को अपनाया और रथ को गिरनार की ओर मोड़ दिया। गिरनार पर्वत के सहसावन में उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई— एक ऐसी अवस्था, जहाँ आत्मा अज्ञान के अंधकार से निकलकर परमात्मा के प्रकाश में विलीन हो जाती है।

यह प्रसंग न केवल त्याग और करुणा की महिमा को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आत्मज्ञान के पथ पर चलने वाला व्यक्ति स्वयं एक दीप बन जाता है, जो अन्यों को भी प्रकाश प्रदान करता है।

श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्मोत्थान चातुर्मास समिति 2025 के अध्यक्ष अमित मुणोत ने बताया कि दादाबाड़ी में सुबह 8.45 से 9.45 बजे साध्वीजी का प्रवचन होगा। आप सभी से निवेदन है कि जिनवाणी का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।

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