
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उनके करीबी माने जाने वाले MLC सचिन अहीर ने पार्टी छोड़कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं।
इस घटनाक्रम को उद्धव खेमे के लिए एक और राजनीतिक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है।
शिंदे गुट में शामिल होते ही बड़ा कदम
शिवसेना शिंदे गुट में शामिल होने के तुरंत बाद सचिन अहीर ने बड़ा राजनीतिक कदम उठाया। उन्होंने महाराष्ट्र विधान परिषद के उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) पद के लिए महायुति उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर दिया है।
यह कदम महायुति गठबंधन की बढ़ती राजनीतिक ताकत को भी दर्शाता है।
लोकसभा में पहले ही लग चुका है झटका
यह पहली बार नहीं है जब उद्धव ठाकरे गुट को बड़ा नुकसान हुआ हो। इससे पहले लोकसभा में भी कई सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसद शिंदे गुट के साथ जुड़ चुके हैं, जिनमें शामिल हैं—
- संजय हरिभाऊ जाधव
- संजय दीना पाटिल
- भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे
- संजय उत्तमराव देशमुख
- नागेश पाटिल अष्टीकर
- ओमराजे निंबालकर
इस बदलाव ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
लोकसभा में मौजूदा स्थिति
नए समीकरण के अनुसार—
- उद्धव ठाकरे गुट: 3 सांसद
- एकनाथ शिंदे गुट: 13 सांसद
इस बदलाव के बाद शिंदे गुट की स्थिति और मजबूत हो गई है।
दल-बदल कानून क्यों नहीं लागू हुआ?
यह राजनीतिक बदलाव दल-बदल विरोधी कानून के तहत कानूनी रूप से सुरक्षित माना जा रहा है।
कारण—
- बगावत करने वाले सांसदों की संख्या पार्टी की कुल ताकत के दो-तिहाई के करीब थी
- ऐसे मामलों में सदस्यता रद्द नहीं होती
- उन्हें दूसरे गुट में शामिल होने की अनुमति मिल जाती है
इस वजह से इन सांसदों पर अयोग्यता की कार्रवाई नहीं हो सकी।
2022 से जारी है शिवसेना विवाद
शिवसेना में विभाजन की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी, जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी।
इसके बाद—
- महाराष्ट्र सरकार गिर गई
- राजनीतिक समीकरण बदल गए
- पार्टी दो गुटों में बंट गई
चुनाव आयोग का फैसला
2023 में चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला लेते हुए—
- शिंदे गुट को “असली शिवसेना” माना
- उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह “तीर-धनुष” दिया गया
- उद्धव गुट को “शिवसेना (UBT)” नाम मिला
इसके बाद से दोनों गुटों के बीच राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष जारी है।
राजनीतिक असर क्यों अहम है?
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि—
- उद्धव गुट लगातार कमजोर हो रहा है
- महायुति की ताकत बढ़ रही है
- आगामी चुनावों पर असर पड़ सकता है
- संगठनात्मक ढांचा तेजी से बदल रहा है




