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जलाशय से समृद्धि तक का सफर, 54 केजो ने बदली मछुआ समिति की तस्वीर

एमसीबी/कभी केवल पानी के स्रोत के रूप में पहचाना जाने वाला ग्राम शंकरगढ़ का 10.70 हेक्टेयर जलाशय आज ग्रामीण आजीविका, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। यह कहानी है ब्लू-लाईन मछुआ सहकारी समिति मर्यादित, मनेन्द्रगढ़ की, जिसने पारंपरिक मत्स्य पालन से आगे बढ़कर आधुनिक केज कल्चर तकनीक को अपनाया और जलाशय की क्षमता को आय के स्थायी स्रोत में बदल दिया।

समिति के अध्यक्ष संतोष मांझी के नेतृत्व में 23 सदस्यीय समिति ने मत्स्य विभाग के सहयोग और तकनीकी मार्गदर्शन से वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत जलाशय में 54 केज स्थापित किए। इन केजो में मोनोसेकस तिलिापया एवं पंगाशियस का वैज्ञानिक तरीके से पालन शुरू किया गया। आज यही 54 केज समिति की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बन चुके हैं।

पारंपरिक मत्स्य पालन से आधुनिक तकनीक तक

ब्लू-लाईन मछुआ सहकारी समिति का पंजीयन 29 अक्टूबर 2021 को हुआ। समिति ने ग्राम शंकरगढ़ स्थित जलाशय को लीज पर लेकर मत्स्य पालन शुरू किया, लेकिन पारंपरिक पद्धति से उत्पादन सीमित था। समिति के सदस्यों ने महसूस किया कि उपलब्ध जल संसाधन का बेहतर उपयोग आधुनिक तकनीक के माध्यम से ही संभव है।

इसी सोच के साथ समिति ने केज कल्चर को अपनाया। मत्स्य विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के सहयोग से 54 केज स्थापित हुए। इसके बाद मछलियों के बीज, आहार, स्वास्थ्य, वृद्धि और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी शुरू हुई। वैज्ञानिक प्रबंधन से मत्स्य पालन अधिक व्यवस्थित हुआ और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

54 केजो से 30-40 टन मछली उत्पादन

वर्तमान में समिति के 54 केजो में मोनोसेकस तिलिापया एवं पंगाशियस का पालन किया जा रहा है। गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज, संतुलित एवं प्रोटीन युक्त आहार और नियमित स्वास्थ्य निगरानी को उत्पादन का आधार बनाया गया है।

मछलियों की उम्र, आकार और वृद्धि के अनुसार आहार की मात्रा तय की जाती है। केजो की नियमित देखभाल, जल की गुणवत्ता की जांच, मछलियों के स्वास्थ्य की निगरानी और समय पर प्रबंधन से उत्पादन प्रक्रिया को व्यवस्थित रखा जाता है।

इसी वैज्ञानिक पद्धति का परिणाम है कि समिति को वर्तमान में लगभग 30 से 40 टन मछली उत्पादन प्राप्त हो रहा है।

50 लाख तक पहुंची आय, 8-12 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ

समिति की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण इसके आर्थिक परिणाम हैं। बेहतर बाजार मूल्य मिलने पर मछलियों की बिक्री से समिति को लगभग 45 से 50 लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है।

इसमें लगभग 30-35 लाख रुपये का चारा, 2-3 लाख रुपये मत्स्य बीज, 4-5 लाख रुपये मजदूरी तथा 1-2 लाख रुपये दवाइयों एवं अन्य प्रबंधन कार्यों पर खर्च होते हैं। प्रमुख खर्चों के बाद समिति को लगभग 8 से 12 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है।

इस आय का सीधा लाभ समिति के 23 सदस्यों को मिल रहा है। प्रत्येक सदस्य को लगभग 34 हजार से 52 हजार रुपये तक लाभांश प्राप्त हो रहा है। इससे सदस्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और सहकारिता के प्रति उनका विश्वास भी बढ़ा है।

मछली पालन से गांव में रोजगार भी बढ़ा

इस पहल का लाभ केवल समिति के सदस्यों तक सीमित नहीं है। केजो की देखभाल, मछलियों को आहार देने, स्वास्थ्य एवं वृद्धि की निगरानी, मछली निकालने, छंटाई, परिवहन और बाजार तक पहुंचाने जैसे कार्यों में 20 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

इस तरह जलाशय से बाजार तक तैयार हुई पूरी आर्थिक गतिविधि ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। मत्स्य पालन अब केवल पारंपरिक आजीविका नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाली संगठित गतिविधि बन गया है।

तकनीक, प्रशिक्षण और सहयोग ने दिखाई राह

समिति की सफलता में मत्स्य विभाग का तकनीकी मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहा है। केज स्थापना से लेकर मत्स्य बीज संचयन, आहार प्रबंधन, जल गुणवत्ता, मछलियों के स्वास्थ्य और उत्पादन प्रक्रिया तक विभाग द्वारा आवश्यक तकनीकी सहयोग दिया गया।

समिति के सदस्यों ने प्रशिक्षण के माध्यम से वैज्ञानिक मत्स्य पालन की बारीकियां सीखी और उन्हें अपने दैनिक कार्य में अपनाया। इससे उन्हें मछलियों की वृद्धि और स्वास्थ्य के अनुसार प्रबंधन करने में मदद मिली।

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