(उमा वाणी) रायपुर
आत्मोत्थान चातुर्मास 2025
शांति, प्रसन्नता और सौम्यता का भाव जीवन को बनाता है बेहतर: साध्वी हंसकीर्ति

*दादाबाड़ी में 27 दिवसीय दादागुरुदेव इकतीसा की धूम, गिरनार तप की पूर्णाहुति 21 को*
रायपुर। श्री जिनकुशल सूरी दादाबाड़ी में आत्मोत्थान चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में गुरुवार को परम पूज्य हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. ने धर्मरत्न प्रकरण ग्रंथ का वाचन करते हुए कहा- जीवन में शांति, प्रसन्नता और सौम्यता स्वयं से ही आरंभ होती है। जब व्यक्ति आत्मचिंतन करता है, अपने व्यवहार को समझता है और हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखता है, तब उसका जीवन बेहतर बनता है।
साध्वीजी ने कहा कि “स्वयं की गहराई से हर प्रसंग को देखना चाहिए, तभी हमारा व्यवहार संतुलित और सौम्य रहेगा।” उन्होंने अपने प्रवचन में कई शिक्षाप्रद प्रसंगों का उल्लेख किया, जो जीवन में सकारात्मक सोच और आत्मनियंत्रण की आवश्यकता को उजागर करते हैं।
क्रोध और क्षमा का जीवन में प्रभाव
एक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति जो स्वभाव से अत्यधिक क्रोधित था, उसके घर पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र लोभी स्वभाव का था, लेकिन पिता का स्वभाव इतना कठोर था कि वह किसी से मधुर व्यवहार नहीं कर पाता था, भले ही सामने वाला उसे उपहार भी क्यों न दे। समाधान की तलाश में वह एक संत के पास पहुँचा, जहाँ संत ने उसे शास्त्रों की दृष्टि से समझाया कि “पिछले जन्मों के संस्कारों के कारण तुम्हारे जीवन में क्रोध की प्रवृत्ति आई है, जबकि पुत्र को देवगति प्राप्त हुई है।” इससे यह शिक्षा मिलती है कि हमें दूसरों की छोटी बातों को लेकर क्रोध नहीं करना चाहिए, बल्कि क्षमा भाव अपनाना चाहिए।
व्यवसाय में सौम्यता का महत्व
एक अन्य उदाहरण में साध्वी जी ने एक कपड़ा व्यापारी का उल्लेख किया, जो अपने विनम्र व्यवहार के लिए जाना जाता था। व्यापारी ने अपने कर्मचारियों को निर्देश दिया था कि हर ग्राहक को धन्यवाद कहें और फिर से आने का आमंत्रण दें, चाहे उसने खरीदारी की हो या नहीं। एक बार एक ग्राहक ने कुछ खरीदे बिना दुकान छोड़ दी। कर्मचारी ने भी मालिक के निर्देश अनुसार उसे आभार जताया, लेकिन ग्राहक ने वाक्य दोहराने को कहा। दुर्भाग्यवश, कर्मचारी ने कुछ अलग शब्दों का प्रयोग कर दिया, जिससे ग्राहक असहज हो गया। इससे यह सीख मिलती है कि व्यवहार में सौम्यता होना आवश्यक है, विशेष रूप से तब जब बात सेवा और संबंधों की हो।
स्वभाव को समझें, क्रोध पर नियंत्रण रखें
साध्वीजी ने कहा कि जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, उसी प्रकार कुछ घटनाएं जीवन में स्वाभाविक होती हैं। यदि कोई व्यक्ति अग्नि में हाथ डालता है और जल जाता है, तो वह अग्नि पर क्रोधित नहीं होता, क्योंकि उसे अग्नि का स्वभाव पता है। इसी तरह, हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों और हानि को समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति ने घर में फूलों की माला और मिट्टी की मटकी रखी। शाम को माला मुरझा गई और मटकी टूट गई। व्यक्ति को माला के मुरझाने पर नहीं, लेकिन मटकी टूटने पर क्रोध आया, क्योंकि उसे माला के मुरझाने का स्वभाव ज्ञात था। यह उदाहरण इस बात को रेखांकित करता है कि जिन चीजों का स्वभाव हमें समझ है, उन पर हम क्रोधित नहीं होते।
आत्मिक हानि की कोई पूर्ति नहीं
अंत में साध्वीजी ने जीवन में धैर्य और आत्मिक विकास की महत्ता पर ज़ोर देते हुए कहा कि “धन-संपत्ति की हानि तो किसी न किसी रूप में पूरी हो सकती है, लेकिन आत्मा की क्षति की पूर्ति संभव नहीं। इसलिए जीवन में संयम, क्षमा और सहजता को अपनाना चाहिए।”
*गिरनार तप की पूर्णाहुति 21 अगस्त को*
गिरनार तप के तपस्वियों का तीन उपवास के बाद आज बियासने से पारणा हुआ। ये तपस्या निरंतर 20 अगस्त तक उपवास और बियासने से चलती रहेगी व तप की पूर्णाहुति 21 अगस्त को होगी।
*27 दिवसीय दादागुरुदेव इकतीसा की धूम*
खरतरगच्छ युवा परिषद के संयोजन व सुरेश भंसाली के निर्देशन में 27 दिवसीय दादागुरुदेव इकतीसा चल रहा है, जिसकी पूर्णाहुति 9 अगस्त को पूर्णिमा पर होगी। साथ ही 10 अगस्त को भक्तिमय वातावरण में अंकित लोढ़ा की भक्ति रहेगी।
श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्मोत्थान चातुर्मास समिति 2025 के अध्यक्ष अमित मुणोत ने बताया कि दादाबाड़ी में सुबह 8.45 से 9.45 बजे साध्वीजी का प्रवचन होगा। आप सभी से निवेदन है कि जिनवाणी का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।



