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TMC में महाबगावत! 20 सांसदों ने बनाया अलग गुट, लेकिन स्पीकर क्यों नहीं ले रहे फैसला? जानिए 91वें संशोधन का पूरा गणित

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मची अंदरूनी बगावत को लेकर है। विधानसभा में बड़ी टूट के बाद अब पार्टी का संसदीय दल भी संकट में दिखाई दे रहा है। लोकसभा में TMC के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग गुट बनाने का दावा किया है, जबकि राज्यसभा में भी इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में चुप क्यों हैं और 91वां संविधान संशोधन इस पूरे विवाद में क्या भूमिका निभाता है?

TMC में बढ़ता जा रहा संकट

राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। विधानसभा में बड़ी संख्या में विधायकों के अलग होने के बाद अब संसद में भी पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

हाल के घटनाक्रम:

  • लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों ने अलग गुट बनाने का दावा किया।
  • राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने सदस्यता से इस्तीफा दिया।
  • इससे पहले सुखेंदु शेखर राय भी पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दे चुके हैं।
  • लोकसभा में चीफ व्हिप को लेकर दो गुट आमने-सामने हैं।

चीफ व्हिप को लेकर बढ़ा विवाद

बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार को अपना चीफ व्हिप घोषित किया है। दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व ने कल्याण बनर्जी को आधिकारिक चीफ व्हिप नियुक्त कर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजा है।

यहीं से मामला और जटिल हो गया है क्योंकि अब यह तय होना है कि सदन में किसे अधिकृत प्रतिनिधि माना जाए।

स्पीकर क्यों नहीं कर सकते तुरंत फैसला?

कई लोगों को लग रहा है कि लोकसभा अध्यक्ष तुरंत बागी गुट को मान्यता दे सकते हैं, लेकिन संवैधानिक स्थिति इससे अलग है।

91वें संविधान संशोधन के बाद दल-बदल कानून को और सख्त बनाया गया था। इसके तहत किसी संसदीय दल के भीतर अलग गुट बनाकर स्वतः मान्यता प्राप्त करने की व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई।

इसका मतलब है कि केवल सांसदों की संख्या अधिक होने से कोई समूह स्वतः नया संसदीय दल नहीं बन जाता।

स्पीकर की भूमिका कब शुरू होती है?

विशेषज्ञों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष केवल विशेष परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकते हैं।

स्पीकर की भूमिका इन स्थितियों में बन सकती है:

  • यदि बागी सांसद किसी दूसरे दल में वैध रूप से विलय कर लें।
  • यदि पार्टी नेतृत्व सांसदों के खिलाफ दल-बदल की शिकायत देकर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग करे।
  • यदि अयोग्यता याचिका दायर की जाए।

जब तक ऐसी स्थिति नहीं बनती, तब तक सांसद तकनीकी रूप से उसी दल के सदस्य माने जाते हैं जिसके टिकट पर वे चुने गए थे।

चुनाव आयोग की भूमिका कब आएगी?

फिलहाल चुनाव आयोग भी इस विवाद में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

चुनाव आयोग तभी दखल देगा जब:

  • दोनों गुट पार्टी के नाम पर दावा करें।
  • चुनाव चिन्ह पर अधिकार का विवाद खड़ा हो।
  • संगठन पर आधिकारिक नियंत्रण को लेकर कानूनी दावा पेश किया जाए।

ऐसी स्थिति में आयोग दस्तावेजों और समर्थन के आधार पर निर्णय लेता है।

कांग्रेस में विलय की चर्चाओं ने बढ़ाई हलचल

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कांग्रेस और TMC के बीच संभावित विलय को लेकर बातचीत हो सकती है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

सूत्रों के हवाले से विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक भविष्य को लेकर बातचीत हुई है। लेकिन अभी तक किसी भी पक्ष ने सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है।

TMC के इतिहास में सबसे बड़ा संकट?

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ही कांग्रेस से अलग होकर हुई थी। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद के बाद अलग राजनीतिक राह चुनी थी और बाद में TMC का गठन किया था।

आज लगभग तीन दशक बाद पार्टी खुद उसी तरह की आंतरिक चुनौती का सामना करती नजर आ रही है। बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों की नाराजगी ने पार्टी नेतृत्व के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।

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