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मोबाईल की स्क्रीन, और बच्चों से बढ़ती दूरी”

उमावाणी न्यूज

 

मोबाईल की स्क्रीन, और बच्चों से बढ़ती दूरी

आज के दौर में माँ-बाप का फोन से लगाव बढ़ रहा है,

पर बच्चों से अपनापन घट रहा है। घर-घर की यही तस्वीर बन गई है – माँ रील देख रही, पापा ऑफिस का काम कर रहे, और बच्चा बीच में “मम्मी देखो” कहकर अकेला रह जा रहा है।

क्या हो रहा है?

1. समय मोबाइल को, दूरी बच्चों को ऑफिस के बाद भी स्क्रॉल करते-करते माँ-बाप के पास बच्चों के लिए

10 मिनट नहीं बचते। बच्चा बात करना चाहे तो जवाब मिलता है “बेटा बाद में, अभी बिजी हूं”।

2. संस्कार की जगह स्क्रीन:

पहले कहानी, दुआ, साथ बैठकर खाना सिखाया जाता था। अब रोते बच्चे को चुप कराने के लिए मोबाइल थमा दिया जाता है। नतीजा – बच्चे को मोबाइल तो मिल गया, पर संस्कार और अपनापन नहीं।

3. बचपन छिन रहा है:

खेल के मैदान खाली, और बच्चों की उंगलियां मोबाइल पर तेज। माँ-बाप की गोद की जगह अब फोन की स्क्रीन ने ले ली है।

मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं

बाल विशेषज्ञ मानते हैं कि 0-10 साल की उम्र में बच्चे को माँ-बाप का स्पर्श, बात और समय चाहिए। मोबाइल देने से बच्चा शांत तो हो जाता है, पर भावनात्मक जुड़ाव कमजोर हो जाता है। यही दूरी आगे चलकर जिद, चिड़चिड़ापन और अकेलेपन का रूप लेती है।

घर से शुरू हो बदलाव

1. नो-फोन टाइम: खाने की टेबल और सोने से 1 घंटा पहले सबके फोन दूर। सिर्फ बातें, सिर्फ अपनापन।
2. स्क्रीन नहीं, संगत दो: मोबाइल देने की बजाय 15 मिनट बच्चा जो चाहे वो करो – लुका-छिपी, ड्राइंग, या बस गले लगाओ।

3. संस्कार फोन से नहीं, आपसे सीखेगा: बच्चा वही

करेगा जो आपको करते देखेगा। आप फोन कम रखोगे, वो भी दुनिया को देखेगा, स्क्रीन को नहीं।

बच्चे को मोबाइल देना गलत नहीं, पर बचपन और संस्कार छीन लेना गलत है।

मोबाइल टूल है, माँ-बाप की जगह नहीं ले सकता।

आपके घर में “नो-फोन टाइम” कितने मिनट का होता है?

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