
भागवत ने कहा कि जब देश युद्ध या गंभीर संघर्ष की स्थिति में हो, तब नागरिकों को सरकार और सेना के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में देश की एकजुटता बेहद जरूरी है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघर्ष समाप्त होने के बाद पुरानी दुश्मनी को हमेशा बनाए रखना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
युद्ध के दौरान सरकार और सेना का साथ जरूरी
मोहन भागवत ने चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि संघर्ष के समय देश को अपनी सरकार और सेना के साथ खड़ा रहना चाहिए।
उन्होंने संकेत दिया कि यदि किसी देश के साथ संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं तो परिस्थितियों के अनुसार उन संबंधों को अस्थायी रूप से सीमित या रोकना भी आवश्यक हो सकता है।
लेकिन उनका जोर इस बात पर रहा कि युद्ध या टकराव खत्म होने के बाद स्थिति को हमेशा के लिए दुश्मनी में बदल देना उचित नहीं है।
संघर्ष खत्म होने के बाद फिर शुरू हो बातचीत
भागवत के अनुसार, जब संघर्ष समाप्त हो जाए तो बातचीत को उसी बिंदु से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए, जहां से वह रुकी थी।
उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को संवाद, सामंजस्य और समाधान की सोच से जोड़ते हुए कहा कि किसी विवाद में दूसरे पक्ष का विनाश ही समाधान नहीं माना जा सकता।
उनकी बातों का सार यह रहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर दृढ़ता जरूरी है, लेकिन शांति की संभावना को हमेशा के लिए खत्म करना जरूरी नहीं है।
भारत-पाकिस्तान के आम लोगों को लेकर क्या कहा?
RSS प्रमुख ने भारत और पाकिस्तान के आम नागरिकों के रिश्तों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सभी लोग भारतीयों के दुश्मन नहीं हैं और भारत के सभी लोग पाकिस्तान के नागरिकों के दुश्मन नहीं हैं।
उन्होंने दोनों देशों के बीच तनाव को मुख्य रूप से राजनीतिक, राज्य और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जुड़ा बताया।
भागवत की इस टिप्पणी में युद्ध और आम नागरिकों के बीच अंतर करने पर भी जोर दिखाई दिया। उनका कहना था कि किसी संघर्ष के दौरान देशहित और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन आम लोगों के बीच स्थायी नफरत पैदा करना समाधान नहीं है।
युवाओं को दिया संवाद और सामंजस्य का संदेश
IIMUN कार्यक्रम में युवाओं के साथ संवाद के दौरान भागवत ने भारत की सोच को केवल संघर्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि समाधान और सह-अस्तित्व की दृष्टि से देखने की बात कही।
उनके बयान के प्रमुख बिंदु:
- युद्ध की स्थिति में सरकार और सेना के साथ मजबूती से खड़ा होना जरूरी।
- राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
- खतरा होने पर किसी देश के साथ संबंध अस्थायी रूप से रोके जा सकते हैं।
- संघर्ष समाप्त होने के बाद बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए।
- स्थायी नफरत और दुश्मनी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
- भारत का दृष्टिकोण संवाद और सामंजस्य पर आधारित होना चाहिए।
- दोनों देशों के आम नागरिकों को एक-दूसरे का स्थायी दुश्मन नहीं माना जाना चाहिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ शांति पर भी जोर
मोहन भागवत के बयान को भारत की सुरक्षा नीति और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। उन्होंने एक तरफ संघर्ष के समय देश की सरकार और सेना के साथ खड़े होने की आवश्यकता बताई, वहीं दूसरी तरफ तनाव समाप्त होने के बाद संवाद की संभावना बनाए रखने पर जोर दिया।
उनका संदेश मूल रूप से यह है कि युद्ध के समय राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा जरूरी है, लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद शांति और संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए। यह सोच भारत-पाकिस्तान जैसे लंबे समय से तनावपूर्ण संबंधों के संदर्भ में खास तौर पर चर्चा का विषय बन सकती है।




