उमावाणी न्यूज
🪴🪴🪴स्वर्ग, नरक और हम
मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्त हो जाए, इसके लिए मनुष्य जीवनभर कितने प्रयास करता है। कोई व्रत* रखता है, कोई दान-पुण्य करता है, कोई तीर्थयात्रा करता है, तो कोई भगवान से मनौतियाँ माँगता है। मानो स्वर्ग कोई नई हाउसिंग सोसायटी हो, जहाँ 1-BHK फ्लैट बुक करने के लिए पुण्य के अंक जमा करने पड़ते हों।
लेकिन मेरे मन में एक प्रश्न उठता है—**क्या ऐसा हो सकता है कि हम पहले से ही स्वर्ग में रह रहे हों?**
ज़रा सुबह उठकर अपने चारों ओर ध्यान से देखिए।
एक बटन दबाते ही रोशनी हो जाती है।
दूसरा बटन दबाते ही पंखा चलने लगता है।
तीसरा दबाते ही एयर कंडीशनर ठंडी हवा देने लगता है।
नल खोलते ही पानी आने लगता है।
गैस जलाते ही कुछ ही मिनटों में भोजन तैयार हो जाता है।
मोबाइल हाथ में लेते ही पूरी दुनिया की जानकारी हमारी हथेली पर आ जाती है।
यदि कोई मित्र अमेरिका में भी हो, तो कुछ ही सेकंड में उसका चेहरा हमारे सामने दिखाई देने लगता है।
फिर भी हम इन सब सुविधाओं को इतनी सहजता से लेते हैं, मानो ये आधुनिक जीवन की विलासिताएँ नहीं, बल्कि हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हों।
ज़रा सोचिए, यदि आज से केवल दो सौ वर्ष पहले का कोई राजा हमारे घर में आ जाए, तो शायद वह बाहर निकलना ही न चाहे।
वह आश्चर्य से पूछे—
“यह क्या? गर्म पानी?”
और यह? ठंडी हवा?”
यह? पूरी दुनिया की जानकारी?”
और यह? दस मिनट में घर पर पिज़्ज़ा?
फिर वह शायद कहे—
मैंने जीवनभर राज्य किया, युद्ध जीते, अपार धन-संपत्ति जुटाई, लेकिन मुझे ये सुख कभी प्राप्त नहीं हुए।
वास्तविकता यह है कि आज का एक सामान्य मनुष्य अनेक मामलों में बीते समय के राजाओं से कहीं अधिक सुख-सुविधाओं में जीवन जी रहा है।
लेकिन विडम्बना देखिए—
हमारी नज़र इन सुविधाओं पर जाती ही नहीं।
क्योंकि मनुष्य के पास जो होता है, उसकी कीमत उसे शायद ही कभी महसूस होती है।
एयर कंडीशनर चल रहा है, इसलिए खुशी नहीं होती।
लेकिन जैसे ही वह खराब हो जाए, दुःख शुरू हो जाता है।
मोबाइल है, इसलिए आनंद नहीं होता।
लेकिन नेटवर्क चला जाए, तो लगता है मानो दुनिया ही समाप्त हो गई हो।
घर होने की खुशी नहीं होती।
लेकिन पड़ोसी का घर बड़ा है, इसलिए दुःख होता है।
गाड़ी होने से संतोष नहीं मिलता।
लेकिन किसी और की गाड़ी बड़ी है, इसलिए मन खिन्न हो जाता है।
मनुष्य अपने ही स्वर्ग में खड़ा होकर, दूसरों के स्वर्ग से अपनी तुलना करता रहता है।
लेकिन इसी पृथ्वी पर एक दूसरा दृश्य भी है।
आज भी लाखों लोग पीने के पानी के लिए घंटों कतारों में खड़े रहते हैं।
कई लोगों के पास रहने के लिए पक्का घर नहीं है।
कई लोगों को यह भी निश्चित नहीं होता कि उन्हें दिन में दो वक्त का भोजन मिलेगा या नहीं।
अनेक बच्चे शिक्षा से वंचित हैं।
कुछ लोगों के पास पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े भी नहीं हैं।
जिन बातों को हम सामान्य समझते हैं, वही किसी और के जीवन का सबसे बड़ा सपना होती हैं।
हमारे घर के नल से पानी अपने आप आ जाता है।
लेकिन किसी को वही पानी लाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
हमें इसलिए क्रोध आता है कि एयर कंडीशनर का रिमोट नहीं मिल रहा।
उन्हें धूप से बचने के लिए किसी पेड़ की छाया ढूँढ़नी पड़ती है।
हम डाइट प्लान खोजते हैं।
वे सोचते हैं कि अगला भोजन कहाँ से मिलेगा।
इसीलिए मुझे लगता है कि स्वर्ग और नरक मृत्यु के बाद मिलने वाले कोई स्थान नहीं हैं।
वे यहीं हैं।
इसी धरती पर।
इसी शहर में।
इसी गाँव में।
कभी-कभी तो एक ही सड़क पर।
एक घर में बेटा इसलिए नाराज़ है कि उसका नया मोबाइल धीमा चल रहा है।
सामने वाले घर का बच्चा इसलिए पढ़ नहीं पा रहा क्योंकि उसके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल ही नहीं है।
एक व्यक्ति इसलिए परेशान है कि गर्म पानी कुछ देर से आया।
दूसरा व्यक्ति केवल पानी मिल जाने पर ही प्रसन्न होकर स्नान कर लेता है।
अंतर केवल परिस्थितियों का नहीं होता।
अंतर दृष्टिकोण का भी होता है।
कुछ लोग नरक जैसी परिस्थितियों में भी मुस्कुराते रहते हैं।
और कुछ लोग स्वर्ग जैसी सुविधाओं में रहते हुए भी हर समय शिकायत करते रहते हैं।
मनुष्य की एक बहुत विचित्र आदत है।
वह हर दिन उन चीज़ों की सूची बनाता है जो उसके पास नहीं हैं।
लेकिन जो उसके पास हैं, उनकी सूची कभी नहीं बनाता।
यदि प्रत्येक व्यक्ति रात को सोने से पहले केवल पाँच बातें लिखे—
* आज मैं साँस ले पा रहा हूँ।
* आज मेरे पास पीने का पानी है।
* आज मेरे पास खाने के लिए भोजन है।
* आज मेरे पास सोने के लिए एक सुरक्षित स्थान है।
* आज मेरे अपने प्रियजन मेरे साथ हैं।
तो शायद जीवन को देखने का हमारा दृष्टिकोण ही बदल जाए।
हम स्वर्ग की तलाश कर रहे हैं।
लेकिन शायद स्वर्ग कोई स्थान नहीं, बल्कि एक अनुभूति है।
और शायद नरक भी कोई स्थान नहीं, बल्कि एक विस्मृति है।
जो हमारे पास है, उसकी कीमत भूल जाना ही नरक है।
और जो हमारे पास है, उसके प्रति कृतज्ञ बने रहना ही स्वर्ग है।
मृत्यु के बाद क्या मिलेगा, यह किसी को नहीं पता।
लेकिन जब जीवित रहते हुए हमें पृथ्वी जैसा अद्भुत ग्रह मिला है, साँस लेने के लिए हवा मिली है, पीने के लिए पानी मिला है, खाने के लिए भोजन मिला है, प्रेम करने वाले अपने लोग मिले हैं, और एक बटन दबाते ही मिलने वाली हजारों सुविधाएँ मिली हैं—
फिर भी यदि हम निरंतर दुःखी ही बने रहें…
तो यह भी किसी विडम्बना से कम नहीं।
शायद ऊपर बैठा भगवान मुस्कुरा रहा होगा और कह रहा होगा—
अरे, मैंने तो तुम्हें पहले ही स्वर्ग में भेज दिया था…. और तुमने वहाँ भी शिकायतों का दफ़्तर खोल लिया!”।


